February 3, 2026
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रेजांग ला की वो सुबह – फिल्म की पृष्ठभूमि

1962 के युद्ध का नाम लेते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में “हार” शब्द घूम जाता है। लेकिन वही साल, वही जंग – लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर एक ऐसी कहानी भी छोड़ गया, जिस पर आज भी भारत का सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है।

“120 बहादुर (120 Bahadur)” इसी भूले हुए अध्याय को परदे पर ज़िंदा कर देती है। फरहान अख्तर की धमाकेदार परफॉर्मेंस और रजनीश ‘रेज़ी’ घई का जबरदस्त निर्देशन इस फिल्म को सिर्फ वॉर मूवी नहीं, बल्कि एक जज्बे में बदल देते हैं – अंतिम आदमी, अंतिम गोली तक।

 

  • फिल्म: 120 Bahadur
  • लीड: फरहान अख्तर – मेजर शैतान सिंह
  • डायरेक्टर: रजनीश ‘रेज़ी’ घई
  • आधार: 18 नवंबर 1962, रेजांग ला की लड़ाई, 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी

 

लद्दाख की जमी हुई बर्फ, हड्डियाँ जमा देने वाली हवा, सीमित गोला–बारूद और पुराने हथियार… इसी बीच खबर आती है कि चीन की फ़ौज आगे बढ़ रही है। आदेश साफ है –

 

“ये चोटी किसी भी कीमत पर दुश्मन के हाथ नहीं जानी चाहिए।”

 

चार्ली कंपनी के सिर्फ 120 जवानों को पता है कि सामने 3000 से ज्यादा चीनी सैनिक आने वाले हैं, फिर भी उनके चेहरों पर डर से ज़्यादा एक अजीब-सा सुकून है – “जब तक हम हैं, ये जमीन अपनी है।”

कहानी: 120 बनाम 3000 – हार नहीं, अमरता की लड़ाई

फिल्म तीन स्तरों पर कहानी खोलती है:

  1. जवानों की ज़िंदगी और रिश्ते
    कोई नए जन्मे बच्चे की फोटो जेब में रखता है, कोई घर के कर्ज की चिंता करता है, कोई छुट्टी की तारीख गिन रहा है। इन छोटे–छोटे पलों से आप हर सैनिक से जुड़ जाते हैं, और जब गोलियाँ चलनी शुरू होती हैं तो हर शहीद आपके अपने जैसा लगता है।
  2. रणनीति और ज़िम्मेदारी
    मेजर शैतान सिंह (फरहान) हर निर्णय इस सोच के साथ लेते हैं कि “अगर हम पीछे हट गए, तो इतिहास हमें कायर लिखेगा।” ऊँचाई, पोज़िशन, दुश्मन की चाल, सबके बीच वो अपने जवानों का मनोबल भी ऊँचा रखते हैं।
  3. आखिरी मोर्चा
    जब रेडियो पर आखिरी रिपोर्ट जाती है –

    “हम यहां से वापस नहीं जाएंगे… हम लड़ेंगे, आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक।”
    तो आपको अहसास होता है कि अब ये लड़ाई जीत–हार से आगे निकल चुकी है। यह सम्मान और शौर्य की लड़ाई है।

क्लाइमेक्स में बर्फ, गोलियाँ, धमाके और चुपचाप टपकती आँसू – ये सब मिलकर ऐसा असर छोड़ते हैं कि क्रेडिट रोल होने के बाद भी आप सीट पर चुप बैठे रहते हैं।

फरहान अख्तर की एक्टिंग: मेजर शैतान सिंह की रूह स्क्रीन पर

फरहान अख्तर ने पहले “भाग मिल्खा भाग” और “लक्ष्य” से जिस स्तर की देशभक्ति दिखाई थी, “120 बहादुर” उसे एक और पायदान ऊपर पहुंचा देती है।

  • उनकी बॉडी लैंग्वेज में एक लीडर की ठहराव भरी ताकत है – सिपाहियों के सामने कभी घबराते नहीं, लेकिन अकेले में नक्शे पर झुकते वक्त उनकी आँखों में चिंता साफ दिखती है।
  • डायलॉग डिलीवरी इतने सटीक हैं कि कई लाइनें सीधे दिल पर उतर जाती हैं।
  • उनकी आँखों का जुनून, आखिरी हमले से पहले वो हल्की–सी मुस्कान – सब कुछ मेजर शैतान सिंह को एक लार्जर देन लाइफ लेकिन इंसानियत से भरा किरदार बना देता है।

सपोर्टिंग कास्ट भी गजब है। अलग–अलग राज्यों से आए 119 जवानों के चेहरे, उनकी बोली, उनका मज़ाक, उनका भाईचारा – ये सब मिलकर चार्ली कंपनी को सिर्फ “प्लाटून” नहीं, एक परिवार बना देते हैं।

 

डायरेक्शन, सिनेमैटोग्राफी और वॉर सीन्स

रजनीश ‘रेज़ी’ घई ने वॉर मूवी का सही अर्थ समझा है – युद्ध सिर्फ गोलियों की आवाज नहीं, दिलों की धड़कन भी होता है।

  • लोकेशन और फ्रेम्स
    बर्फ से सफेद पहाड़, पतली हवा, तिरंगा फहराती छोटी-सी पोस्ट – हर फ्रेम पोस्टर जैसा लगता है।
  • एक्शन और VFX
    गोलीबारी, मॉर्टार, बर्फीले तूफ़ान, दुश्मन की भीड़ – सबकुछ इतना रियल लगता है कि आपको सीट पर बैठकर भी ठंड महसूस होने लगती है।
  • बैकग्राउंड स्कोर
    शांत सीन में हल्का म्यूज़िक, अटैक के समय धड़कनों को तेज कर देने वाला स्कोर – म्यूज़िक फिल्म की रीढ़ की हड्डी है।

 

 

थोड़ा संतुलित नजरिया – कमजोर कड़ियाँ

ईमानदारी से कहा जाए तो फिल्म में दो–तीन छोटी बातें हैं जो सबको पसंद न आएँ:

  • पहला हिस्सा थोड़ा स्लो
    किरदारों को सेट करने में समय लगता है, जिससे कुछ दर्शकों को शुरुआत हल्की धीमी लग सकती है।
  • कुछ जगह ज़्यादा इमोशनल सीन
    घर से आए खत, आँसू भरे क्लोज़-अप – इंडियन ऑडियंस को ये चीजें पसंद आती हैं, लेकिन कुछ लोगों को थोड़ा ज़्यादा ड्रामा लग सकता है।

फिर भी, जब फिल्म अपने असली मूड – रेजांग ला की लड़ाई – में पहुँचती है, तो ये छोटी खामियाँ भूल जाती हैं।


याद रह जाने वाले डायलॉग्स

ब्लॉग में डालने लायक कुछ दमदार डायलॉग्स:

“हम यहां से वापस नहीं जाएंगे… हम लड़ेंगे, आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक।”
“बर्फ हमारा कफन बनेगी, लेकिन यह चोटी दुश्मनों के हाथ नहीं जाएगी।”
“हम कम हैं, पर हिम्मत ज्यादा है।”
“ये 120 नहीं, 120 बहादुर हैं… और बहादुर पीछे नहीं हटते।”

ये लाइनें फिल्म खत्म होने के बाद भी कानों में गूंजती रहती हैं।

फाइनल वर्डिक्ट: क्यों देखनी ही चाहिए “120 बहादुर”

“120 बहादुर” सिर्फ फिल्म नहीं, एक सलामी है – उन 120 अमर शहीदों को, जिनके कारण आज भी रेजांग ला का नाम लेते ही हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

  • अगर आपको “शेरशाह” या “उरी” पसंद आई थी, तो ये फिल्म आपको ज़रूर छू लेगी।
  • अगर आप 1962 के युद्ध को सिर्फ हार के चश्मे से देखते हैं, तो यह फिल्म आपको याद दिलाएगी कि उसी साल हमने ऐसी वीरता भी दिखाई थी जिसे दुश्मन भी भूल नहीं पाए।

रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5)

थिएटर से बाहर निकलते वक्त आँखें थोड़ी नम होंगी, लेकिन दिल में एक ही बात घूमेगी –

“काश, इन 120 बहादुरों के बारे में हमें स्कूल की किताबों में पहले ही बताया गया होता।”

 

 

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